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कब्ज़े में देरी पर रेरा: ब्याज सहित रिफ़ंड या हर महीने का ब्याज?

बिल्डर ने कब्ज़े में देरी की? RERA धारा 18 में ब्याज सहित रिफ़ंड या देरी का मासिक ब्याज, ब्याज की गणना और यूपी में मुआवज़ा।

By the legal team at Neeraj Associates · Updated 22 October 2026 · 6 min read

Practice areas: RERA Cases REAT Appeals

टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ · अंतिम समीक्षा: अक्टूबर 2026 · 6 मिनट में पढ़ें

Read in English: Delayed possession: refund or interest under RERA

संक्षिप्त उत्तर: अगर बिल्डर एग्रीमेंट फ़ॉर सेल में लिखी तारीख़ तक कब्ज़ा नहीं देता, तो RERA अधिनियम, 2016 की धारा 18(1) घर खरीदार को विकल्प देती है। वह प्रोजेक्ट से हटकर पूरी रकम का रिफ़ंड ले सकता है, जिस पर हर भुगतान की तारीख़ से ब्याज मिलेगा। या वह प्रोजेक्ट में बना रह सकता है और कब्ज़ा मिलने तक देरी के हर महीने का ब्याज ले सकता है। उत्तर प्रदेश में ब्याज की दर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का MCLR और 1% है। बाकी नुकसान का मुआवज़ा न्यायनिर्णायक अधिकारी के पास अलग दावा है। शिकायत दर्ज करने का तरीका हमारी यूपी रेरा शिकायत गाइड में है।

धारा 18 के दो विकल्प

धारा 18(1) तब लागू होती है जब बिल्डर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाता या कब्ज़ा नहीं देता:

  • एग्रीमेंट में लिखी तारीख़ तक, या
  • अपना कारोबार बंद होने के कारण, या RERA रजिस्ट्रेशन निलंबित या रद्द होने के कारण।

ऐसे में खरीदार चुन सकता है:

  1. ब्याज सहित रिफ़ंड: प्रोजेक्ट से हटकर चुकाई गई रकम ब्याज और मुआवज़े के साथ वापस लेना। धारा 19(4) भी आवंटी को यह अधिकार देती है, अगर बिल्डर एग्रीमेंट का पालन न करे या कब्ज़ा न दे सके।
  2. देरी का ब्याज: प्रोजेक्ट में बने रहकर कब्ज़ा मिलने तक देरी के हर महीने का ब्याज लेना। यह धारा 18(1) के परंतुक में है।

विकल्प चुनने का अधिकार खरीदार का है, और इससे दूसरे उपाय ख़त्म नहीं होते। UP RERA नियम, 2016 के नियम 16 के अनुसार ब्याज और मुआवज़े सहित रिफ़ंड देय होने के 45 दिन के भीतर चुकाया जाना है।

ब्याज की गणना कैसे होती है?

  • दोनों पर एक ही दर: धारा 2(za) के अनुसार बिल्डर और खरीदार में से जो भी चूक करे, दोनों पर एक ही दर से ब्याज लगता है।
  • यूपी की दर: उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) (एग्रीमेंट फ़ॉर सेल/लीज़) नियम, 2018 के मॉडल एग्रीमेंट में रिफ़ंड और देरी, दोनों का ब्याज SBI के होम लोन MCLR में 1% जोड़कर तय है। MCLR समय-समय पर बदलता है, इसलिए आदेश की तारीख़ पर लागू दर देख लें।
  • रिफ़ंड: हर भुगतान पर उसकी तारीख़ से रिफ़ंड मिलने तक ब्याज लगता है।
  • देरी का ब्याज: चुकाई गई रकम पर कब्ज़े की तय तारीख़ से असल कब्ज़ा मिलने तक ब्याज लगता है।

एक सरल उदाहरण (गोल आँकड़े, सिर्फ़ समझाने के लिए):

15 अक्टूबर 2026 से SBI का एक साल का MCLR 8.85% है, इसलिए MCLR + 1% लगभग 9.85% बनता है। हिसाब आसान रखने के लिए हम इसे 10% सालाना मान रहे हैं।

  • बिल्डर को चुकाई गई रकम: ₹40,00,000
  • 10% सालाना की दर से देरी का ब्याज = ₹4,00,000 सालाना, यानी लगभग ₹33,333 महीना
  • 2 साल 6 महीने की देरी पर कुल ब्याज लगभग ₹10,00,000

रिफ़ंड में यही दर हर किस्त पर उसकी भुगतान तारीख़ से लगती है। जैसे, पाँच साल पहले चुकाए गए ₹10,00,000 पर लगभग ₹5,00,000 ब्याज बनता है, जबकि एक साल पहले चुकाए गए ₹10,00,000 पर लगभग ₹1,00,000। हर भुगतान की तारीख़ और रकम की तालिका बनाकर रखें, क्योंकि शिकायत में यह गणना दिखनी चाहिए।

रिफ़ंड लें या बने रहें? किन बातों पर सोचें

  • प्रोजेक्ट की प्रगति: UP RERA वेबसाइट पर तिमाही प्रगति रिपोर्ट और फ़ोटो देखें। क्या प्रोजेक्ट पूरा होता दिखता है?
  • आपकी आर्थिक स्थिति: रिफ़ंड से पैसा वापस आता है और लोन का ब्याज रुकता है। बने रहने पर फ़्लैट पुरानी कीमत पर मिलता है, साथ में देरी का मासिक ब्याज।
  • अधिभोग प्रमाणपत्र (OC): कंप्लीशन और ऑक्युपेंसी सर्टिफ़िकेट लेना बिल्डर की ज़िम्मेदारी है (धारा 11(4)(b))। देखें कि "कब्ज़े का ऑफ़र" इनके साथ आया है या नहीं।
  • होम लोन: अगर बैंक या त्रिपक्षीय समझौता है, तो रिफ़ंड आदेश में आम तौर पर बैंक के बकाये का ध्यान रखना पड़ता है।
  • अप्रत्याशित परिस्थिति (force majeure): असली force majeure पर बिल्डर रजिस्ट्रेशन की अवधि बढ़ाने की माँग कर सकता है (धारा 6)। देखें कि रजिस्ट्रेशन वास्तव में बढ़ा या नहीं, और कितने समय के लिए।

मुआवज़े का क्या?

ब्याज आपके पैसे के इस्तेमाल की भरपाई है। बाकी नुकसान, जैसे इंतज़ार में चुकाया किराया, लोन का अतिरिक्त ब्याज या मानसिक उत्पीड़न, का मुआवज़ा धारा 71 और 72 के तहत न्यायनिर्णायक अधिकारी से माँगा जाता है। इसके लिए फ़ॉर्म N है (UP RERA नियम, 2016 का नियम 34)। मुआवज़ा तय करते समय अधिकारी देखता है (धारा 72):

  • बिल्डर को हुआ अनुपातहीन लाभ या अनुचित फ़ायदा
  • खरीदार को हुआ नुकसान
  • क्या गलती बार-बार की गई
  • अन्य प्रासंगिक बातें

किराए की रसीदें, लोन स्टेटमेंट जैसे सबूत सँभालकर रखें।

शिकायत में क्या माँगें

  • साफ़ विकल्प: ब्याज सहित रिफ़ंड, या देरी के ब्याज के साथ कब्ज़ा
  • तय दर (SBI MCLR + 1%) से ब्याज, हर भुगतान के हिसाब से भुगतान की तारीख़ तक
  • शिकायत के साथ भुगतान की तालिका: हर किस्त की तारीख़, रकम और रसीद नंबर
  • नियमों में तय समय (नियम 16 के तहत 45 दिन) के भीतर भुगतान का निर्देश
  • ज़रूरत हो तो न्यायनिर्णायक अधिकारी के पास मुआवज़े का अलग दावा
  • कार्यवाही का ख़र्च

शिकायत कैसे दर्ज करें, कौन-सा फ़ॉर्म लगेगा और फ़ीस कितनी है, यह हमारी यूपी रेरा शिकायत गाइड में क्रमवार बताया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देरी का ब्याज चुनने के बाद क्या मैं फ़ैसला बदल सकता हूँ?

बिल्डर की चूक पर अधिनियम विकल्प खरीदार को देता है। बाद में विकल्प बदला जा सकता है या नहीं, यह केस और प्रोजेक्ट के चरण पर निर्भर करता है। इसे जितनी जल्दी हो सके प्राधिकरण के सामने उठाएँ।

अगर बिल्डर देर से ही सही, फ़्लैट पूरा करके कब्ज़ा दे, तो क्या ब्याज मिलेगा?

हाँ। धारा 18(1) के परंतुक के अनुसार कब्ज़ा मिलने तक देरी के हर महीने का ब्याज देय है।

क्या रिफ़ंड सिर्फ़ मूल कीमत का मिलता है?

धारा 18(1) में बिल्डर को मिली रकम की बात है। इसमें आम तौर पर बिल्डर को चुकाई गई सारी रकम आती है, लेकिन सरकार को गए वैधानिक शुल्कों पर अलग नज़रिया हो सकता है।

कौन-सा MCLR लगता है: एक साल का या कोई और?

यूपी के नियमों में SBI के होम लोन MCLR और 1% की बात है, अवधि (tenor) का ज़िक्र नहीं है। आदेश में लगाई गई दर लिखी होती है। ऊपर के उदाहरण में एक साल का MCLR सिर्फ़ समझाने के लिए लिया गया है।

अगर आदेश के बाद भी बिल्डर भुगतान न करे तो?

रकम धारा 40(1) के तहत भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूली जा सकती है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। RERA आदेश के बाद वसूली और अपील पर अलग गाइड इसी श्रृंखला में आ रही है।

बिल्डर दिवालिया हो गया हो तो क्या रिफ़ंड का दावा कर सकते हैं?

बिल्डर पर दिवाला कार्यवाही चलने से वसूली का तरीका और फ़ोरम बदल जाता है। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत घर खरीदार वित्तीय लेनदार माने जाते हैं। अपने प्रोजेक्ट के बारे में अलग से सलाह लें।

लेखक: टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ

ईमेल: rishi.saxena@neerajassociates-legal.com · फ़ोन: +91 8960006363

इस गाइड पर कोई सवाल? यहाँ बताए गए कानून के बारे में आपका कोई सवाल हो, तो rishi.saxena@neerajassociates-legal.com पर लिखें। चुने हुए सवालों के जवाब इस गाइड के आगे के अपडेट में दिए जाएँगे। इस वेबसाइट के माध्यम से हम किसी व्यक्तिगत मामले पर सलाह नहीं देते।

अस्वीकरण: यह लेख अक्टूबर 2026 तक की सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। ब्याज का उदाहरण सिर्फ़ समझाने के लिए है, दरें बदलती रहती हैं, और हर मामला उसके तथ्यों पर निर्भर करता है। अपनी स्थिति के बारे में किसी अधिवक्ता से सलाह लें।

Disclaimer: This article is general information about Indian law and is not legal advice. Laws, rules and court rulings change, and your situation may differ. Please consult an advocate before acting.

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